सुप्रीम कोर्ट ने कहा- हरियाणा-पंजाब व केंद्र मिलकर निकाले एसवाईएल का समाधान, बात नहीं बनेगी तो हम कराएंगे आदेश लागू

वायस ऑफ पानीपत (देवेंद्र शर्मा)
सतलुज-यमुना लिंक नहर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब, हरियाणा और केंद्र सरकार को मीटिंग करने को कहा है। कोर्ट ने कहा कि तीनों पक्ष एक बार कोर्ट के आदेश को लागू करने को लेकर मीटिंग करें। अगर तीनों की मीटिंग से कोई नतीजा नहीं निकलता तो हम अपना आदेश लागू कराएंगे। सुप्रीम कोर्ट 3 सितंबर को मामले की अगली सुनवाई करेगा।
लंबी कानूनी और राजनीतिक लड़ाई के बाद भी मामले में कोई हल नहीं निकला है। केंद्र सरकारें भी लगातार जहां सीधे दखल से बचती रहीं, वहीं दो राज्यों से जुड़ा मसला होने के कारण राष्ट्रीय दलों के सुर पंजाब में कुछ और होते हैं तो हरियाणा में कुछ और। अब एक बार फिर लोकसभा चुनाव में SYL मुद्दा बनी है।


नहर निर्माण की अधिसूचना जारी हुए 43 साल बीत गए हैं। इस दौरान हरियाणा में आठ मुख्यमंत्रियों ने सोलह बार सरकारें बनाईं, लेकिन पंजाब से पानी कोई नहीं ला पाया। कई मौके आए जब पंजाब, हरियाणा और केंद्र में एक ही पार्टी या सहयोगी दलों की सरकारें रहीं, लेकिन पानी का विवाद सुलझाने में किसी ने दिलचस्पी नहीं दिखाई।
70 और 80 के दशक में SYL के निर्माण की शुरुआत चौधरी देवीलाल ने की। बाद के दशकों में वोट के लिहाज से नहरी पानी भले ही ज्यादा फायदेमंद न रहा हो, मगर राजनेताओं ने मुद्दे को मरने नहीं दिया। 1976 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बनारसी दास गुप्ता की अगुवाई में हरियाणा ने अपने हिस्से में नहर की खोदाई शुरू की। 1980 में नहर निर्माण का काम पूरा कर लिया गया। चुनावों में इसका पूरा फायदा कांग्रेस को मिला और तत्कालीन मुख्यमंत्री भजनलाल ने फिर सरकार बनाई।


1987 में चौधरी देवीलाल को सत्ता दिलाने में SYL ने मुख्य किरदार निभाया। नहर को लेकर राजीव-लोंगोवाल समझौते का लोकदल व भाजपा ने पुरजोर विरोध किया। तब तक भजनलाल केंद्र में चले गए थे और बंसीलाल के हाथों में कमान आ चुकी थी। समझौते में हरियाणा के हिस्से के पानी को घटाने पर देवीलाल ने न्याय युद्ध छेड़ा और 23 जनवरी 1986 को जेल भरो आंदोलन किया। नतीजन, 1987 में लोकदल व भाजपा ने हरियाणा की 90 विधानसभा सीटों में से 85 पर जीत दर्ज करते हुए इतिहास रच दिया।
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